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व्रतारम्भ

व्रतारम्भ

जो अग्निहोत्री नहीं हैं उनके लिए विविध व्रत कहे गये हैं | वार्षिक व्रत जैसे रामनवमी, कृष्णाष्टमी,  महाशिवरात्री आदि जिस माह के हैं उसी माह से आरंभ होंगे; किन्तु अन्य साप्ताहिक-पाक्षिक-मासिक व्रतों के आरंभ हेतु मार्गशीर्ष (अगहन) माह - शुक्ल पक्ष को विशेष महत्व प्राप्त है |
  गुरु एवं शुक्र का उदित रहना शुभ होता है | यदि सातों वार का व्रत हो तो सम्बंधित वाराधिपति ग्रह का उदय होना भी निश्चित किया जाना चाहिए |
    गुरु का वक्री, अतिचारी, बाल, वृद्ध, नीच (मकर राशि) या सिंहस्थ होने को भी व्रतारम्भ में अशुभ कहा गया है |
    अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, मूल, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और रेवती नक्षत्र हों तो उत्तम |
    व्रत संबंधित तिथि | उदयाग्राह्य तिथि के लिए आधे दिन तक रहने की बात कही गई है |

    वैधृति एवं व्यतीपात योग पूर्णतः, परिघ का आधा एवं अन्य विरुद्ध योगों का एक चरण अशुभ होता है |

   विष्टि करण (भद्रा) निषिद्ध है; परन्तु विपरीत भद्रा अर्थात दिवा भद्रा रात में और निशा भद्रा दिन में शुभद कहे गये हैं |
  
    सोम, बुध, गुरु एवं शुक्रवार शुभ वार होते हैं |

    पुरुष को गुरु आज्ञा मिले तो उत्तम परन्तु स्त्री को पति की अनुमति अनिवार्यतः लेनी चाहिए |

     व्रतों में अनिवार्यतः पालन करने योग्य नियम :-
१: क्षमा
२: सत्य
३: दया
४: दान
५: शौच (स्वच्छता)
६: इन्द्रियनिग्रह (इन्द्रियों पर संयम)
७: देवतापूजन
८: सन्तोष
९: अस्तेय (चोरी न करना)
१०: अग्निहोत्र (व्रत विशेष में निर्दिष्ट हो तो)
क्षमा सत्यं दया दानं
     शौचं इन्द्रियनिग्रहः |
देवपूजाग्निहवनं
     संतोषः स्तेयवर्जनं ||

   इसके अतिरिक्त जो व्रत हो उसकी कथा सुननी चाहिए, व्रत के देवता का ध्यान-मंत्र जप आदि  | व्रत संबंधित देवता का भजन-कीर्तन करना चाहिए | अधिकांशतः व्रतों में निशा जागरण का भी निर्देश है | यात्रा नहीं करनी चाहिए |
   सौभाग्वती स्त्रियों के लिए लाल कपड़ा एवं श्रृंगार धारण कहा गया है, विधवा के लिए श्वेत वस्त्र धारण कहा गया है |

  व्रतभंगता : बार-बार जल पीना, ताम्बूल भक्षण (पान खाना), दिन में सोना, मैथुन क्रिया, रोना, क्लेश, क्रोध व्रतभंग कारक हैं |

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