सर्व वेदमयी विद्या गायत्री पर देवता ।।
परस्य ब्रह्मणो माता सर्व वेदमयी सदा॥
महाभावमयी नित्या सच्चिदानंद रूपिणी ।। -स्कन्द पुराण ॥
अर्थात् -- गायत्री सर्व वेदमयी परा विद्या है ।। यही ब्राह्मण की माता है ।। यही नित्य सच्चिदानंद स्वरूप तथा महा भावमयी है ।।
गायत्री वेद जननी गायत्री ब्राह्मणः प्रसूः ।।
गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन गीयते॥ स्कन्द पुराण 9/51
गायत्री वेदों की माता है, गायत्री ब्राह्मण की माता है ।। यह गायन करने वाले का त्राण- उद्धार करती है इसलिए गायत्री कहते हैं ।।
मातात्वं च कुतः कश्च पिता एमात्समुद्भवः ।।
कुलात्कस्य समुत्पन्नातिद ब्रह्मेति ब्राह्मणः॥
गायत्री मातुमेवं तं पिता देवोपि सम्भवः ।।
ब्रह्मकुल समुत्पन्नमिदं ब्रह्मेति ब्राह्मणः॥ -महोपनिषद्
मेरी माता कौन? पिता कौन? कुल कौन? जो इस रहस्य को जानता है वह ब्राह्मण है ।। ब्राह्मण की गायत्री ही माता है, वेद ही पिता है, ब्रह्म ही कुल है ।।
ब्राह्मण के जीवन का लक्ष आत्म- बलं एवं ब्रह्मतेज को प्राप्त करना होता है ।। वह जानता है कि संसार में जो कुछ उत्तम है वह सभी आत्मबल और ब्रह्मतेज उपलब्ध करने पर प्राप्त किया जा सकता है ।। इसलिए वह सम्पूर्ण आनन्दों के लिए वेद जननी गायत्री का ही आश्रय लेता है
परस्य ब्रह्मणो माता सर्व वेदमयी सदा॥
महाभावमयी नित्या सच्चिदानंद रूपिणी ।। -स्कन्द पुराण ॥
अर्थात् -- गायत्री सर्व वेदमयी परा विद्या है ।। यही ब्राह्मण की माता है ।। यही नित्य सच्चिदानंद स्वरूप तथा महा भावमयी है ।।
गायत्री वेद जननी गायत्री ब्राह्मणः प्रसूः ।।
गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन गीयते॥ स्कन्द पुराण 9/51
गायत्री वेदों की माता है, गायत्री ब्राह्मण की माता है ।। यह गायन करने वाले का त्राण- उद्धार करती है इसलिए गायत्री कहते हैं ।।
मातात्वं च कुतः कश्च पिता एमात्समुद्भवः ।।
कुलात्कस्य समुत्पन्नातिद ब्रह्मेति ब्राह्मणः॥
गायत्री मातुमेवं तं पिता देवोपि सम्भवः ।।
ब्रह्मकुल समुत्पन्नमिदं ब्रह्मेति ब्राह्मणः॥ -महोपनिषद्
मेरी माता कौन? पिता कौन? कुल कौन? जो इस रहस्य को जानता है वह ब्राह्मण है ।। ब्राह्मण की गायत्री ही माता है, वेद ही पिता है, ब्रह्म ही कुल है ।।
ब्राह्मण के जीवन का लक्ष आत्म- बलं एवं ब्रह्मतेज को प्राप्त करना होता है ।। वह जानता है कि संसार में जो कुछ उत्तम है वह सभी आत्मबल और ब्रह्मतेज उपलब्ध करने पर प्राप्त किया जा सकता है ।। इसलिए वह सम्पूर्ण आनन्दों के लिए वेद जननी गायत्री का ही आश्रय लेता है
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